Pasmanda Movement of india

" पासमान्दा वॉइस "

पसमांदा मूल रूप से फ़ारसी भाषा का शब्द है ये पस और मांदा नामक दो शब्दों से मिलकर बना है। पस का अर्थ होता है पीछे और मांदा का अर्थ होता है essays impromptu speaking techniques छूटा हुआ अर्थात पीछे छूटा हुआ। 

                आम इसतलाह (बोल चाल की भाषा) में पसमांदा शब्द उन (वर्गो/जातियों) के लिए प्रयोग किया जाता है जो विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। हालांकि पसमांदा शब्द का सम्बन्ध किसी विशेष धार्मिक समूह के पिछड़े लोगो से नही है लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में आम तौर पर मुस्लिमो के पिछड़े वर्गो【1】के सम्बन्ध में ही ये शब्द बोला व समझा जाता है।

                 यदि पसमांदा शब्द को और स्पष्ट किया जाये तो हम कह सकते है कि मुसलमानो की वह तमाम जातियाँ जिनको भारत में मौजूद लगभग-लगभग सभी फिरको【2】के संस्थापको सहित उनके लगभग सभी प्रमुख ओलमाओं【3】द्वारा अपनी पुस्तको/फतवो【4】 में अजलाफ व अरज़ाल अर्थात नीच, कमीन व निकृष्ट लिखा गया तथा अशराफ (सैयद, शेख, मिर्ज़ा, मुग़ल आदि) का गैर कुफू माना गया है।

                 पसमांदा वर्ग मुसलमानो में मौजूद उन जातियों का वर्ग हैं जिनकी स्थिति लगभग 800 साला तथाकथित मुस्लिम (दर असल अशराफ) हुकूमत के बाद भी नही सुधर सकी बल्कि सच तो ये है कि जिनकी स्थिति तथाकथित मुस्लिम शासनकाल के बाद ही कुछ सुधरी किन्तु इतनी नही सुधरी कि वह विकास की दौड़ में अन्य मुस्लिम जातियों के साथ तो दूर अन्य धर्मो की पिछड़ी जातियों के साथ भी स्पर्धा करने लायक हो सके। 

                मुसलमानो में मौजूद ज़ाति/जन्म आधारित ऊँच-नीच नामक कोढ़ रूपी व्यवस्था की वह सच्चाई जिसको मुस्लिम लीडरशिप व ओलमाओं द्वारा कभी भी मंच से अथवा गैर मुस्लिमो के सामने दौराने बहस (ओलमाओं द्वारा स्वयं किताबो में लिखने के बाद भी) स्वीकार नही की जाती, मुस्लिम समाज में मौजूद उस कोढ़ रूपी व्यवस्था व उससे उतपन्न पसमांदा की दयनीय दशा को देखकर 1901 की बंगाल की जनगणना के सन्दर्भ में जनगणना अधीक्षक की रिपोर्ट अवलोकनीय है जिसमे उसने विस्तारपूर्वक मुस्लिम समाज में मौजूद तीन वर्गो (अशराफ,अजलाफ,अरज़ाल) का वर्णन किया हैं, जिसका उल्लेख डॉक्टर अम्बेडकर ने भी अपनी पुस्तक “Pakistan or partition of India” में भी किया है।

               इसी प्रकार स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार द्वारा जितने भी आयोगों का गठन पिछड़े वर्गो को आरक्षण हेतु चिन्हित करने के लिए किया गया है उन सभी आयोगों ने इस्लाम में जन्म/ज़ाति आधारित ऊँच-नीच के न होने के सिद्धांत को स्वीकार करने के बाद भी भारतीय मुस्लिमो में जातियों का होना तथा ज़ाति/जन्म आधारित भेद-भाव को स्वीकार करते हुए जन्म/ज़ाति आधारित भेद-भाव की शिकार जातियों की सही स्थिति का अवलोकन करते हुए उनको पिछड़ा माना तथा उनके लिए आरक्षण की सिफारिश भी की। इस मामले में विचारणीय प्रश्न ये है कि तमाम आयोगों ने उन्ही जातियों को पिछड़ा पाया जिनको तमाम फिरको के ओलमाओ ने अशराफ का गैर घोषित करते हुए अजलाफ व अरज़ाल (नीच, कमीन निकृष्ट) तक लिखा है तथा जिनका वर्णन 1901 के बंगाल की जनगणना के सन्दर्भ में जनगणना अधीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में अजलाफ व अरज़ाल के रूप किया है।

               मेरे ख्याल से पसमांदा शब्द क्या है पसमांदा कौन लोग हैं इसको स्पष्ट करने की और आवश्यकता नही है ? मैं अपने कथन को अपने इस विचार, अनुभव व ऐतिहासिक तथ्य को आपके समक्ष रखते हुए समाप्त करना चाहूँगा कि-

               ” पसमांदा समाज को ये सदैव याद रखना चाहिए कि मुसलमामों की जिन जातियों को सभी फिरकों के ओलमाओं ने जलील करने व पीछे रखने के उद्देश्य से क़ुरआन व हदीस की मनमानी व्याख्या द्वारा अजलाफ अरज़ाल अर्थात नीच निकृष्ट कमीन का सर्टिफिकेट दिया उन जातियों को भारत सरकार सहित भिन्न-भिन्न प्रदेशों की सरकारों द्वारा गठित लगभग सभी आयोगों ने (अपने-अपने क्षेत्र/विषय के अंतर्गत) तरक़्क़ी व सम्मान देने के उद्देश्य से आरक्षण के दायरे में लाने के लिए उन्हें पिछड़ा व अतिपिछड़ा का सर्टिफिकेट दिया तथा भारतीय संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए 10 अगस्त 1950 के प्रेसीडेंशियल आर्डर (अनुच्छेद 341 पर लगे धार्मिक प्रतिबन्ध) को हटाने की सिफारिश की तथा संविधान सभा ने अनुसूचित ज़ाति व अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट दिया।

====================

सन्दर्भ-

【1】- पिछड़ा शब्द में ओबीसी, एस0सी0, एस00टी0 सहित अन्य (अति, सर्वाधिक )पिछड़े वर्ग सम्मिलित हैं।

【2】-बरेलवी, देवबंदी, अहले हदीस, जमाते इस्लामी आदि

【3】- अहमद रज़ा ख़ाँ, सैयद हसमत अली, मुफ्ती अहमद यार ख़ाँ, अशरफ अली थानवी, मुफ्ती शफी, क़ासिम नानौतवी, मुफ्ती अज़ीज़ुर्रहमान, मुफ्ती ज़फ़्रुद्दीन, सैयद मीयाँ मोहम्मद नज़ीर हुसैन, सैयद नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ाँ भोपाली, अबुल आला मौदूदी, अमीन अहसन इसलाही, अबुशर जलील आदि।

【4】-फतावे रिजविया, शाने हबीबुर्रहमान मिन आयातुल क़ुरआन, बहारे शरीअत, बहिश्ती ज़ेवर, तारीख दारूल essays impromptu speaking techniques उलूम देवबन्द, फतावे दारूल उलूम देवबन्द, नेहायतुल अरब फी गायातुन नसब, फतावे नज़ीरिया, अख्तियार अलसादा बायशारुल इल्म अलीउल अबादा, हलाला की छुरी, तरजुमानुल क़ुरआन, तदबिरे क़ुरआन, इस्लाम का तसवुरे मसावात।)

एडवोकेट नुरुल ऐन मोमिन

Close Menu
Powered By Indic IME